|| हरे माधव दयाल की दया ||

वाणी संत सतगुरु बाबा नारायण शाह साहिब जी
।। बिरह बिन न उपजत है, भाव भगत का खेला ।।
।। बिरह न जिस आत्म उपजै, सो आत्म मुक्त न होव भाई ।।
।। कहे नारायण शाह सुनहो प्यारों, प्रीत सार से खुद को सवारो ।।
।। विरह न उपजे जिस तन, सो गुरुमुख कैसे होवे ।।

आज के सत्संग की वाणी शहंशाह सतगुरु बाबा नारायण शाह साहिब जी की प्रेम विरह से भरी ऊँची इल्लाही वाणी है । आप साहिबान जी फरमाते हैं, सभी पूर्ण सन्तों ने परमात्मा और सतगुरु में कोई भेद नहीं माना है। सतगुरु कुल मालिक का प्रत्यक्ष रूप है।
पुर्ण सन्तों ने जप तप, पुण्यदान, तीर्थ, व्रत, हठकर्म तथा त्याग आदि को नही अपितु सच्चे प्रेम तथा सच्ची भक्ति को ही, परमात्म प्राप्त का सच्चा साधन कहा है । इसी वास्ते पूर्ण सन्तों की वाणियों में सच्ची प्रेमाभक्ति का बहुत बल दिया जाता है। भक्ति तथा प्रेम में कोई अंतर नही है ।
सभी पूर्ण संतों के अनुसार मेहरबान परमेश्वर के दरबार में केवल प्रेमाभक्ति का ही आदर है। सच्ची भक्ति, पूर्ण प्रेम और अपने प्रियतम (सतगुरु) से बिछोड़े की तड़प, विरह कहलाती है।
आज सच्चे पातशाह सांई नारायणशाह साहिब जी जिन्होंने खुद अपने सतगुरु से सच्ची प्रीत और सच्चा प्रेम किया, उन्हीं की अनमोल वाणी से यह विरह प्रेम का भेद प्रदान हो रहा है-
बिरह बिन न उपजत है, भाव भगत का खोला
यह सर्व समरथ सन्त सतगुरु शहंशाह बाबा नारायणशाह साहिब जी द्वारा फरमाया गया अनमोल सीख प्रदान करने वाला शब्द है। सन्तमत या गुरुमत में सतगुरु की सेवा और प्रेम प्रमुख है, सेवा समर्पण से पूर्ण होती है और प्रेम एकता से आनन्द प्रदान करता है।
हाज़िरां हजूर मौजूदा विराजमान संत सतगुरु बाबा ईश्वरशाह साहिब जी ने फरमाया-
प्रीत बहुत संसार में नाना विधि की सोय
उत्तम प्रीत सो जानिए सतगुरु से जो होय
भाव यह कि संसार में सब तरफ प्रीत का ही पसारा है और एक प्रीत का ही आसरा है पर संसार द्वैत में है, परमात्मा एकत्व में है। संसार है भी और नहीं भी पर परमात्मा सदा मौजूद अविनाशी है और सतगुरु, परमात्मा के प्रकट रूप हैं। सच्चे पातशाह जी निज अनुभव से फरमाते हैं कि प्रेम तो सारे संसार में कार्य कर रहा है पर सबसे उत्तम प्रेम वह है जो वक़्त के मौजूदा सतगुरु से किया जाता है फिर वह प्रेम परमात्मा स्वरुप सतगुरु में उसे एकाकार कर देता है, फिर चौरासी के बंधनों की बात नहीं रहती, काल - माया के जाल की बात नहीं होती। प्रेमी भगत सतगुरु प्रेम में पतंगा बन बांवरा रहता है, हर पल अपने सतगुरु चरणों में रहना चाहता है, उससे एक पल की जुदाई बर्दाश्त नहीं होती, बाहर अंतर बस सतगुरु प्रेम में मस्त रहता है, ऐसे विरह प्रेम में मस्त आतम आंतरिक उन्नति करती है, ऐसी ऊँची विरह प्रीत के बिना आतम रूह ऊँचे मण्डलों में रसाई नहीं कर सकती-
विरह न जिस आत्म उपजै, सौ आत्म मुक्त न होवे भाई
विरह का अर्थ है जुदाई का दर्द । जब प्रेमी को प्रीतम नहीं दिखाई देता और वह उसकी जुदाई में तड़पता है, उस तड़प का नाम है विरह । सच्चा प्रेमी भगत अपने प्रियतम सतगुरु का एक पल भर का भी वियोग सहन नहीं कर सकता । इसी वास्ते सभी सन्तों महात्माओं ने सच्चे भक्त, सच्चे सिख सेवक की सतगुरु स्वरूप परमात्मा से जुदाई की तुलना, मछली की पानी से, पपीहे की स्वाती बूंद से और चकोर की चाँद से जुदाई की तड़प जैसी मिसाल देकर समझाया है। सच्चे सेवक के प्राण अपने सतगुरु के चरणों में लगे रहते है। सतगुरु ही उसकी जान और रूह होता है इसिलये वह अपने सतगुरु के वियोग में तड़पता है।
सच्चा प्रेमी, बिना सतगुरु के नहीं जी सकता है और अगर जीता हुआ दिखता भी है तो बांवरा बनकर रहता है, दुनिया उसे पागल और नाकामी कह ताने मारती है पर वह अपने दुख से दुखी है, उसे अपने सतगुरु के विरह का दुःख है और उसे यह अपना दुख बड़ा ही सुख देने वाला लगता है, मस्त रहता है, दुनिया के तानों की कोई परवाह ही नहीं। बस अपने प्यारल के प्रेम वियोग में मग्न रह आतम सुख को बढ़ाता है।
बाबाजी फरमाते हैं कि, विरह ही सच्चे प्रेम की निशानी है और जुदाई, विरह और  प्रेम की परख भी है, सौगात भी। बिना जुदाई, विरह नहीं, बिना प्रेम विरह की कल्पना ही नहीं  की जा सकती। जितना प्रेम परवान होगा उतनी ही विरह प्रबल होगी और जितनी विरह प्रबल होगी, उतना ही प्रेम परवान होगा। जो जिसको जितना ज्यादा चाहता है, वह उसके लिए उतना ज्यादा तड़पता है। इसी वास्ते विरह सच्चे प्रेम का प्रतीक भी है और सच्चे प्रेम का टकसाल (खजाना ) भी। यह प्रीत को प्रकट भी करती है और परिपक्व भी। विरह की पीड़ा ही शिष्य के अंदर ,सतगुरु से मिलाप की चाह को प्रबल करती है और सतगुरु को भी दौड़कर प्रेमी भगत के पास आने को मजबूर करती है । बाबा फरीद जी फरमाते है-
बिरहा बिरहा आखीए, बिरहा तू सुल्तान।
फरीदा जित तन बिरह न उपजै, सौ तन जाण मसान।।
अपने प्रीतम प्यारे सतगुरु जी से मिलाप के सभी साधनों में यह विरह सबसे शिरोमणि साधन है, यह उनके ही नसीब में होती है, जिन्हें जुदाई का दुख मिलता है जिस तरह बेहद कड़कती धूप में मीलों चलने के बाद वृक्ष की छाया का जो सुख है। वह सबसे ठण्डा अनुभव कराने वाला सुख है ,उस सुख को वही जानते हैं, जिन्होंने कड़कती धूप को सहा है। कूलर और ए.सी. या अन्य दूसरे साधन उसका मुकाबला नहीं कर सकते। जिससे सतगुरु जुदा हुए हैं उसके ही अंदर मिलाप की तड़प है और जिससे हृदय में अपने सतगुरु से मिलाप की तड़प नहीं है वह मुर्दे के समान है, मनहूस के समान है। ऐ रब के अंश! सतगुरु का विछोड़ा व मिलाप की चाह को बढ़ाओ, सतगुरु के पारब्रम्ह स्वरूप नूरानी रूप से प्रेम कर उसके मिलाप की विरह को बढ़ाओ, सच्चा प्रेम करो।
पूर्ण सन्तों ने ही सच्चा प्रेम किया, उन्होंने ही विरह के दर्द को जाना और उसकी कद्र करनी सिखाई है। सच्चे पातशाह  सांई नारायणशाह साहिब जी ने फरमाया है-
जिन मन प्रीत नाहीं गुरु चरणां, से तो भूत प्रेत ज्यों रहते
भटके खोटे काले करम करते, प्रीत वन्तों को जाने नाही जग यह
कहें नारायणशाह सुनो साधो सभए प्रीत झूठ, गुरु चरना प्रीत सार
कहा कि विरह वह कुठाली है, जिसमें प्रेम रूपी सोने की जुदाई की आग में तपाया जाता है ।  जिस तरह सोने को कुठाली में तपाने से इसकी मैल आग में जल जाती है, ठीक उसी तरह विरह की आग अहंकार को जलाकर आत्मा रूपी सोने को कुंदन बना देती है। इसी वास्ते सन्त कबीर जी ने फरमाया है
बिरहा मो से यो कहै, गाढ़ा पकड़ो मोहि।
चरन कमल की मौज में लै पहुंचाओ तोहि।।
भाव यह कि विरह की तड़प दुखदायी जरूर है पर एक दिन यह विरह, प्रेमी भगत को अपने सतगुरु परमात्मा के अगोचर अलौकिक रूप से मिलाप का सुख और उनकी दया और प्रेम भरी दृष्टि का अवर्णनीय भण्डार प्राप्त करवाती है। इसे सम्भाल कर रखना चाहिए। सच्ची विरह, सच्चे वैराग्य और सच्चे त्याग को स्थापित कर देती है, जिसकी मिसाल सच्चे पातशाह सांई नारायणशाह साहिब जी ने अपने शहंशाह सन्त सतगुरु कुल मालिक सांई माधवशाह साहिब जी से मिलाप कर कायम की। अपना सब कुछ आपजी ने अपने सच्चे पातशाह बाबा माधवशाह साहिब जी के चरणों में न्यौछावर कर दिया।
आपजी ने स्वांस - स्वांस सतगुरु माधवशाह साहिब जी को याद किया और निजमन को सतगुरु चरणों में लीन कर दिया, खुद को खोकर खुदा रूप हो गये । यही सच्चा सिमरन है और यही सच्ची गुरु भक्ति है। योग, भक्ति और ज्ञान आदि  से प्राप्त होने वाले सभी फल सतगरु सेवा और प्रेम के बल से सहज प्राप्त हो जाते हैं और सच्चे प्रेम की प्राप्ति का आधार है, सच्ची विरह ।
जिसके हृदय में सतगुरु और परमात्मा से सच्चे मिलाप की सच्ची चाह है उसके सिमरन और ध्यान में भी उतनी ही तड़प होती है, उसका ध्यान फ़ौरन शरीर के नौ द्वारों को खाली करना जानता है। वह तन मन की सुध भूलकर शीघ्र अतीशीघ्र आंखों के पीछे पहुंचकर अपने सतगुरु से अपने अंदर मिलाप कर सकता है और उनके नूरी स्वरूप का दीदार कर सकता है। जो फल वर्षो से किये नीरस सिमरन से नहीं मिलता, वह विरह में तड़पती आत्मा को पल भर के सिमरन में मिल जाता है और वह भगत जीवन मुक्त्त हो जाता है।
सच्चे पातशाह सांई नारायणशाह साहिब फरमा रहे हैं इसी विरह के द्वारा ही हमें अपने सतगुरु के चरणों की प्रीत और सच्चा आनदं प्राप्त हुआ है इसी से सच्ची सेवा सिमरन कर सकें है, यही विरह की सार है।
बिरह प्रीत प्यारी साची भगती, नामे नामो अनूप सुखवासी
सच्चेपातशाह जी फरमा रहे है कि सच्चे भक्तों को ही यह विरह भक्ति की प्रीत, प्रीतम के द्वारा दुःख देने पर भी प्यारी लगती है। इसी वास्ते गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामायण में फरमाया है कि मैं सन्त और असन्त दोनों को एक समान जानकर वन्दना करता हूँ क्योंकि ये दोनों ही एक समान दुःख के दाता है, असन्त (दृष्ट) जन पास रहकर दुख देते है और सन्त सतगुरु दूर होकर दुख देते है। मेरा किसी पर ज़ोर नहीं, दोनों अपनी मनमानी करते हैं, मैं गरीब तुलसी भला सहने के अलावा क्या कर सकता हूँ।
विरह में दुखी मुझ गरीब के पास रोने के अलावा और कोई चारा नहीं, आंसुओं के सिवाय कोई धन नहीं, बिन सतगुरु अब लगता कहीं यह मन नहीं, अब तो मुझे लगने लगा है उस बेदर्दी के दिल में रह गया अपनापन नहीं । विरह का घाव जिन्हें लगा, वे विरही रूहें पुकार करती हैं, उलाहना देती हैं अपने बाबल को।
हे मेरे सतगुरु! सभी आपको दया का सागर कहते हैं । क्या आपको पता नहीं कि आपके दर्शन के बिना हम लोगों को जीना कितना भारी पड़ रहा है, आप ही ने तो बतया है कि मछली बिना पानी के जिन्दा नही रह सकती, स्वाती बूंद के बिना पपीहा जैसे तड़पता है, माता के दूध के बिना जैसे बच्चा रोता है, हे सच्चे पातशाह ! एक दिन की एक झलक दर्शन के बिना हमारी हालत भी इनसे कुछ कम नहीं है, तू जान ले ओर यह मान ले कि तुझ बिन क्यूँ जिउ रे, सच्चे पातशाह! तुम्हारे दर्शन और मिलाप के सिवाय हमें कुछ भी नहीं चाहिए। अपनी मुस्कान भरे नूरानी चेहरे का दीदार दो । अब और न सता मेरे सतगुरु । साँई बुल्लेशाह को अपने सतगुरु से बिछोड़े पर विरह की ऐसी वेदना हुई कि उनके मुख से ऐसे शब्द भी फरमान हुए-
दिल लोचे माही यार नूं
इक हस हस गल्ला कर दियां, इक रोंदिया धोंदिया मरादियां
आप कहते हैं कि एक तो वे भाग्यशाली आत्मायें है मेरे सतगुरु, जो आपके साथ रहकर हंसते खेलते हैं, एक हम हैं कि जिनका पल-पल रोने-धोने में व्यतीत हो जाता है, हे सच्चे पातशाह! या तो हमें भी साथ ले जाना था या आपको हमसे दूर न जाना था । आपजी के दर्शन और मिलाप के बिना मुझे शांति नहीं है -
न जीवां महराज मैं तेरे बिण ना जीवां, न जीवां महराज मै तेरे बिण न जीवां
इन्हा सुक्कया फुल्लां विच वास नहीं, जेहड़े सांई साजण साडे पास नहीं
बुल्लेशाह वदेसो औदा, हत्थ कंगणा ते बाही लटकौंदा
सिर सदका तेरे नाओं दा, सिर सदका तेरे नाओं दा
सच्चे पातशाह सांई नारायणशाह सहिब जी फरमा रहे हैं कि विरह की अवस्था का भी पूरा फायदा उठाओं विरह की घड़ी में सतगरु द्वारा प्राप्त सच्चे नाम का अभ्यास करो, उस शब्द व नाम के अभ्यास में अंतर सुख का अनुभव करो । विरह द्वारा अनूप रूप का दर्शन भी सुलभ होगा और जिस्मानी अनुपम छवि सतगरु से मिलाप का भी सुख मिलेगा । इसी वास्ते विरह भक्ती में डूबकर सतगरु का नाम पुकारो, सतगरु को हियरे धारो, सतगरु का करो भरोसा, अब कुछ न करो अफसोसा। पर विरही आतम प्रेम में पुकार कर दर्शन बिना रह नहीं पाता, कितना भी समझाओ भरोसा दो, पर इतने पर भी मन नहीं मानता, नहीं समझता, बाल हठ की तरह दर्शन, दर्शन, दर्शन ही चाहता है, यह मेरा कुटीचल (डीठ) है, इस दर्शन चाहिए, बस दर्शन।
प्रेम पूर्ण स्वतंत्र है। भगत जो चाहे करे, वह जो चाहे कहे, सतगरु से सच्चा प्रेम ही अनमोल और बच्चों के समान प्यारे बोल कहलवाता है।
जिस तरह अध्यापक के पीटे जाने पर भी जिसकी पढ़ाई में रुचि ही नहीं होती, उसी तरह मुझे भी अपने सतगरु के प्रेम और मिलाप के बगैर कोई दूसरी बात अच्छी नहीं लगती । मेरे माता-पिता मित्र संबंधी भी मुझे कोसते है, परन्तु मैंने बहुत प्रयत्नों के बाद अपने सतगरु से निह (अखिया) लगाई हैं। इसलिये मैं अब इस प्रेम पाठ के अलावा और कुछ नहीं पढ़ सकता । मैं अजीब दुविधा में हूँ। मैं अपने सतगरु को छोड़ नहीं सकता और सतगरु है कि मेरी और ध्यान ही नहीं देता। हे सच्चे पातशाह! आप निर्मोही हो न! यदि आपको हमारी तरह प्रेम का रोग लग जाये, तभी आप हमारे साथ न्याय कर सकोगे अन्यथा नहीं। हमारी अवस्था को समझकर, अब हम पर तरस खाओ और वापस आ जाओ सच्चे पातशाह ।
हे सतगरु! मैं आपको पत्र लिखता हूँ, आप उसका भी जवाब नहीं देते, सारा संसार जैसे खाने को दौड़ता है, मैंने बड़े बड़े ज्योतिषीयों से पूछा, कि मेरा अपने सतगरु से कब मिलाप होगा, जो जो समय उन्होंने बताया सब गुजर गया, क्या यह हमारा दुर्भाग्य है या उनकी गणित ठीक नहीं है। हे सच्चे पातशाह! हम सोचते हैं कि शायद स्वप्न में ही दर्शन हो जायें पर अब तो नींद भी हमारी दुश्मन बन गई है-
मुहिंजे दिल जे बाग खे, डियण कोई व्यो लुटे
निंड्र भी नथी अचे, रात भी नथी खुटे
रो-रोकर आँखों का पानी भी समाप्त हो गया है । परन्तु पता नहीं किस शत्रु ने कौन सा ऐसा जादू कर दिया है, कि आप हमारी  हालत पर ध्यान नहीं देते। हे सच्चे पातशाह ! आप ही बतायें कि आपसे प्रीत करने पर हमें आंसुओ और कांटो के छत्र के सिवा क्या मिला! अब हमारी यही प्रार्थना है आपजी के श्री चरणों में, या तो हमें भी अपने पास बुला लो अन्यथा आप स्वयं आकर दर्शन देकर निहाल करो। इसी दर्शन की तड़प के लिये बाबा फरीद ने फरमाया-
कांगा करग ढंढोलिया, सगला खाया मास
एह दो नैना मत छुहियो मोहे पिर देखा कि आस
हे कागा! बेशक तुझे मेरा मास खाना है तो खा ले, किन्तु मेरी इन दोनों आंखों को मत छूना क्योंकि - मुझे मेरे सतगुरु के दीदार की पूरी आस है, मेरी इन आखों को मुर्शिद के दर्शन जरूर होंगे । बेशक सारा शरीर अब बिना सतगरु के मेरे किसी काम का नहीं, पर मेरी आंखों का अभी पूरा काम है। मेरे सतगरु इन आंखों को अपना दर्शन देकर निहाल करेगें । मुझे अपने सतगुरु पर पूरा भरोसा है, विश्वास है, उन्होंने वचन दिया है, शीघ्र आकर दर्शन देने का ।
माता मीरा जी विरह की आग का अनुभव करते हुए फरमाती हैं, ऐ मालिक! अगर मैं जानती होती, कि प्रीत के कारण इतना दुख होता है, दया का सागर करुणा का भण्डारी सतगुरु बेदर्दी हो जाता है, तो सारे शहर में नगाड़ा बजा बजाकर सबको मना करती कि कोई भी प्रीत न करना, अपने सतगुरु से, भले ही तू हमें विरह का दर्द दे रहा, पर हे सतगुरु! आपके दर्शन और मिलाप में वह सुख है जो किसी भी अन्य पदार्थ में नहीं। आपके सुहिणे मुख को निहार-निहार कर जो नैनों से नीर बहते है, वो मेरी आतम को धो देते हैं, मेरी आतम सुख पा लेती है, अगोचर का। जिसे बयां नहीं किया जा सकता । बड़े बेदर्द हैं सतगुरु ।
ये इतने बेदर्दी हैं, कि हमने इनसे प्रेम किया, इन्होंने हमारे सीने को बिछोड़े का घाव देकर, खुद तो चले गये, हमें रोता छोड़कर-
जिस्मो जिंद नू लै गये कढके
इन्हें पता ही नहीं, कि इनके जाते ही हमारी जान भी हमारे जिस्म से निकल गई है, इतनी बड़ी बात हमारे साथ हो गई और इनके दिल में एक तोले मात्र जितना भी ख़ौफ ख्याल नहीं, कि पीछे हमारा क्या होगा-
आवण कह गये फेर न आये
हम से कहकर गये कि जल्दी वापस आयेगें, इनका क्या भरोसा अब आ कर भी अपना कौल (वचन) किस तरह निभाएगें, हम सदा सुस्त और भूल करने वाले इनसे प्रीत इश्क कर बैठे पर लगता है कि शायद यह भी ठगी का ही व्यापार करते हैं, हमें ठग गए , कहते कुछ हैं, करते कुछ । इतना कहने के बाद अब तो एक ही रास्ता बचता है कि चुपचाप सहन करें, जुदाई जहर भरे घूट पीते रहे ये करेंगे, अपने मन की इनको कहने से कुछ फायदा नहीं होगा, हमने तो इतने दिन दुख दर्द सह ही लिया है, अगर वह इसी में खुश हैं, तो हम और रोकर उन्हें खुश करेंगे, सच्चे पातशाह! आपकी खुशी में ही हमारी खुशी है। हमारे आंसू  प्रिय हैं, तो हम आंसू ही बहायेंगे, बस हमारी यही इल्तिज़ा है, दूर न करना श्री चरणों से, अपने श्रीचरणों की छांव में पड़े रहने देना, विरह विछोड़े का दर्द सह लेंगे, लेकिन चरणों की जुदाई न सह सकेंगे मेरे रहबर न सह सकेंगे।
सो प्यारी संगतों! हमे भी चाहिए कि सतगुरु चरणों  में अटूट निह प्रेम बनाए रखें, कि इक पल की जुदाई भी असहनीय बन उठे, विरह का घाव ऐसा लगे कि सतगुरु की सुहानी महक अंदर आ बसे, तब ही रूहानी कैफियत से रूह भर उठेगी । हम सभी, आज के उंचे रब्बी वाणी-वचनों से लाभ उठाकर सच्ची विरह, सच्चे नाम ,सच्चे शब्द को पाकर सच्चे मालिक सतगुर से अपने अंतर में मिलाप करने की कोशिश करें ।
।। कहे नारायणशाह  सुनहो प्यारों, प्रीत सार से खुद को सवारो ।।
।। विरह न उपजे जिस तन, सो गुरुमुख कैसे होवे ।।

हरे माधव  हरे माधव  हरे माधव