।। हरे माधव दयाल की दया ।।

वाणी संत सतगुरु बाबा माधवशाह साहिब जी
 
।। संतन भगति नाम भेद जनाऐं।।
।। संतन सदा आतम राम रस जणाऐं ।।
।। कहे माधवशाह मेरे पुरखदाता।।
।। अनहल रूप रंग अचरज निज रूप हमारो ।।
।। सब गावें ताकि सदा तत्व रब  महिमा ।।

शहंशाह सतगुरु बाबा माधवशाह साहिब जी तत्व भेद का खुलासा अपनी निज अनुभव वाणी में कर रहे हैं।
पूर्ण सतपुरखों ने हर युग में सच और झूठ का खुलासा किया तथा जीवों के उद्धार के लिए उन्हें तत्व नाम का भेद दिया। आप जी फरमाते हैं सृष्टि का रचनाकार सत्य है, सारा जगत उसकी माया है, हर घर में परम ज्योति चैतन्य अंश आत्मा के रूप में एक समान एक जैसी समाई है। सभी देवी- देवताओं में वह एक सामान, परम प्रकाश,अगम ज्योति के रूप में वास करता है।

कामिल रहबर, मस्त मौला, सतगुरु बाबा माधवशाह साहिब जी फरमाते हैं, कि भजन सिमरन के भंडारी पूरण सतगुरु ही इस संसार में रुहानी तालीम, उस खुली किताब की तरह बयां कर समझाते हैं, पर हमारा मन, अहंकार मनमति में उस रूहानी तालीम को समझ नहीं पाता। आपजी हमारे मन के वेग को बाहर से रोक कर रूहानी तत्व नाम, तत्व इबादत से जोड़कर अंदर की दुनिया में, अंदरूनी आतम मस्ती में भरना चाहते हैं, क्योंकि आपजी खुद ऐसी खुदाई मस्ती में मस्त हैं, वे ऐसी ही हकीकत का इल्म इस दुनिया को भी देते हैं, क्योंकि सभी असल सत्य से नीचे ही हैं और परम सत्य सबसे ऊपर है, उसे जानना बहुत कठिन है, आज संसार में ज्ञान- ध्यान की लाखों दलीलें बातें हो रही हैं, पर ऐ प्यारों, वह विषय तो इबादत का है और नाम की कुंजी अपार है, जो पूरे मुर्शिद हमें देते हैं, पूरण संत सतपुरुषों ने उस अचरज स्थिति का यूं बयां किया, ऐ प्रभु मालिक हरे माधव दाता हजारों लाखों तेरी आँखें हैं, मगर हम मनमुख जीव बाहरमुखी आंखों से देखते हैं, तो एक भी आँख नहीं दिखती। हे! मेरे मालिक तेरे लाखों, करोड़ों पद हैं, परंतु मनमुख जीवों को तेरे पद नहीं दिखते। जिन रूहों ने सच्चे सतगुरु के उपदेश को तहे दिल से माना, उन्होंने ही इबादत, सिमरन का, नूरानी खजाना पा लिया, क्योंकि जो सच्चे मुर्शिद की पनाह में आ गए, वे तो अल्लाह की पनाह में आ गए। आला मुर्शिद पर एक टिक भरोसा टिकाना, अल्लाह पर भरोसा टिकने की कला है। प्रभु ही उन्हीं के रूप में आला दरवेश बनकर आते हैं।

हे प्यारों! उनकी रमज रजा में किन्तु, परन्तु की लकीरें मत खींचो, सुख-दुःख, यश-अपयश, लाभ-हानि या अन्य प्रारब्ध को उसी का हुक्म जान कर मीठे प्रेम भाव से सहज स्वीकार करो, कबूल करो, और उसी की रजा में रमे रहे।
पूर्ण संत सतगुरु का अवतरण इस काल मन माया के देश में, जीवात्माओं को नाम भक्ति एवं रूहों के कल्याण के लिए होता है। वे निष्काम हो, जाति मजहबों के दायरों से ऊपर होकर हमें असल रुहानी हकीकत के नूरे हुजूर से मिला लेते हैं। इस कलिकाल में जीव का सच्चा सहाई, परम हितैषी सतगुरु के अलावा और कोई नहीं, बाकी सारे दुनिया के लोग तो मनमाया के राह पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

        जो अपने आत्म रूप परिपूर्ण सर्वत्र में अभेदता की अनुभूति करना चाहते हैं, तो प्रथम बात यह कि सतगुरु के हुकुम आदेश को तहे दिल से मानना एवं उनकी राजा में राजी रहना, संगत प्रीत प्रतीत होना, ये राज ही हमें परमात्म तृप्ति में इक रूप, तद् रूप, समरूप कर सकते हैं। जैसे समुद्र की लहरें समुद्र में ही लीन हो जाती हैं, वैसे ही साध-संगत सतगुरु नाम से अटूट प्रेम, अटूट विश्वास कर रूह निर्वाण पुरुख में लीन हो सकती है। जैसे कि जल तत्व समुद्र, और लहरों में कोई भेद नहीं होता, वैसे ही आत्मा और परमात्मा अभेद है, पर क्रोध, अहम् यह हमें उस ऊँचाई की शान में रोशन होने नहीं देता। जैसे कि मलीन अंतःकरण वाले मनमुख की दशा रहती है कि अंदर में वह क्रोध, अहम् को पाले रखता है, कि संगत में आया, थोड़ा सा किसी ने उसकी बात अनसुनी कर दी, तो वह आपे से बाहर उठकर क्रोध व अहंकार में फूल जाता है, यह गुरुमुख पुरुष के भाव नहीं होते, पर अहंकार और क्रोध ने उसके अंदर का मनमुखपन जगा दिया और फिर हमें उस लोगों की दशा देख विचार करना चाहिए, कि थोड़ी सी इतनी सी बात पर इतना क्रोध मद् सर चढ़ गया अर्थात् इन्होंने अपने अंदर क्रोध, अहंकार को बिठाने की तान लगा दी।  हे! मेरे प्यारों बगैर साध- संगत की 'जी हुजूरी' जब तक न होगी, तब तक हमारा मन मनिराम, हमारी आंतरिक वृत्तियां दुरुस्त नहीं कर पाएगी। साध-संगत की शान में हमारा मन हमें समझाता है कि तुझे पूर्ण अवस्था मिल गई है, पर जब तक पूर्ण अनुभवी सतगुरु संतपुरख की संगत में नहीं आए, तब तक रूह पूरण आनंद को नहीं पा सकती, वह जो बगैर सतपुरुष के जो आनंद प्राप्त करता है, वह तो कुछ वक्त की बदली के समान होता है अर्थात थोड़े समय के लिए। फिर अहंकार क्रोध घर और घाट को शमशान बना देता है, आज भी ऐसे रंग तमाशे होते हैं, पर सतगुरु दया महर, से हमें नवाजते हैं। साध-संगत से भाव प्रेम से जुड़े मन को मोड़े, फिर उस अनुभव का अनुभव हो जाता है, शर्त यह सतगुरु संगत से बेपनाह प्रेम मोहब्बत हो। हुजूरों ने फरमाया, संत सतगुरु का रुहानी मार्ग भ्रमों वहमों से नहीं भरा होता, वह तो शुद्ध रूहानी प्रेम की रुहानी रोशनी से भरा होता है, लेकिन जीवों ने मनमनीराम के रंग, संग, ढंग,भोग विलास, आशा,  इच्छा के वशीभूत हो, स्वयं को भरमाता फिर रहा है। युगों कल्पों की यह कहानी है, कि पूर्ण सतगुरु तो सुरत नाम तथा प्रेम के निर्मल पावन जल से धोकर परम हंस, परम मस्ती में मस्त कर देते हैं। वे कभी-कभी कठोर से कठोर कटु से कटु सद्उपदेशों द्वारा जीवों को झूठे मद्होश अज्ञान से निकाल, निज हकीकत का बोध हर समय देते ही रहते हैं। वो पावन निर्मल रूहें हैं, जो तत्व नाम को पाकर, सिमरन ध्यान में लग, सतगुरु दर्शन व साध संगत में आकर अपने अंतर की सारी मलीनता को धो देती हैं।  तथा उनकी आत्मा सदैव रूप-स्वरूप में तदरूप हो जाती है ।

जब तक वक्त का प्रगट रूप सतगुरू न मिले, तब तक गांठे कैसे खुलें, क्योंकि चेतन ये चेतनता की यात्रा करा सकता है। इंसान भूल गया है क्योंकि इसे आदत है जिससे लेना है उसकी याद बनी रहती है और जिसको देना है, उसे भुला देता हैं।

श्रीमद् भगवद् गीता में आया-
 तव्दिध्दि प्राणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शन:।।

भाव यह कि उस तत्व नाम ज्ञान का भेद तत्वदर्शी द्वारा ही पूर्ण सतगुरु के चरण, शरण में आकर उस उपदेश को पाया जा सकता है। सतपुरुष तत्व नाम का अमृत प्रसाद देकर रुहानी अनुभव अपनी दया प्रीत से सिखाते हैं।

जिनकी गाँठे खुली हैं, उन्होंने ही अपनी अनुभवी रूहानी रब्बीवाणी में कह दिया कि सतगुरु से रूहानी प्रेम, प्रीत ही हमारी सोई चेतना को जगाती है। प्रभुदाता ,सतगुरु में प्रगट हैं, इसलिए आप देखोगे उनमें रुहानी ठंडक रूहानी कशिश, वह आपकी आत्मा को अपनी ओर खींच लेता है। और रूह को अपार ही अपार आत्मिक आनंद प्राप्त होता है।

क्योंकि असल फूलों को देखकर ही चिड़ियाँ चहचहाती है, कागज के फूलों या फूलों की तस्वीरों को देख चिड़ियाँ कभी नहीं गुनगुनाती। अपार प्रभु की रूहानी सौंदर्यता वक्त के पूरे मुर्शिद में मौजूद होती है, जितना अधिक आप अंतर से सतगुरु के अमृत नाम से जुड़ेंगे, उतना ही बाहरी आकर्षण दूर होगा और अंदरूनी आकर्षण बढ़ेगा। सतगुरु से प्राप्त रूहानी आनंदमयी नाम भक्ति के जरिए ऊंची अनुभूति होगी, लेकिन ध्यान रहे मेरे प्यारों! किसी अधूरे कच्चे गुरु की भक्ति से ये सबकुछ नहीं मिलेगा ।
संतजी ने संसार की स्थिति का पूर्ण खोल कर बयां किया-

जिह खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि और देव। कहे कबीर सुन साधवा, कर सतगुरु की सेव।।

जिस प्रभु की महिमा सुर नर मुनि जन गाए जा रहे हैं, उस प्रभु के दीन दर्शन तो वक्त के पूरे सतगुरु देव की संगत से हमें मिल सकता है । संत जी ने फरमाया कि नाम भक्ति, सतगुरु मालिक सरल माधुर्य रूप कर, हमें नाम भक्ति प्रसाद रूप में दे देते हैं।  हे प्यारों! सतगुरु साध- संगत से प्रीत बढ़ाऐं, सच्चाई , पवित्रता विचारों को शुद्ध रखें, तथा सभी प्रेमीजनों के साथ सुन्दर और सरल स्वभाव बन मीठी वाणी का प्रयोग करें, तब ही अपने मालिक का सभी में एक नूर दर्शन पा सकते हैं।

बाबा जी ने स्पष्ट किया कि अगर डॉक्टर के पास मरीज जाए और उस उसे दवाई मिले, दवाई कड़वी हों या मीठी, मरीज का फर्ज है, उसे खाना, तभी स्वस्थता होगी। आप जी इशारा कर रहे हैं प्यारे, सतगुरु, मुर्शिद, दाता रजाए, तो जीवों की भलाई के लिए सिमरन, इबादत का भेद देते हैं।

वे हमें उस अखण्डता में ही मिलाना चाहते हैं, उस देश की सैर कराना चाहते हैं, जहाँ आतम परमातम परम प्रकाश सुशोभित जर्रे-जर्रे, कण-कण में महक रहा है, वे हमें उसी तरह महकाना चाहते हैं।  सच्चे संत, सच्चे पूर्ण साधु जिन्होंने उस प्रसाद को बगैर सोचे विचारे टाल-मटोल किए, रजाए भाणां माना, उन्हें ही वह नूर आ गया। बंधुओं याद रखना मजनू भी पूरा सिद्ध नहीं कर सका, बस बोल दिया, मेरी आँख से देखो, तो तुम्हें पूरा दिखेगा, दूसरे की आँख से तुम्हें परख कैसे होगी? क्योंकि हमारी आंखों में नेकी का सुरूर नहीं है। पूर्ण संत सतगुरूओं की आँखों में ही वह सुरूर है पर हमें देखना नहीं आता,  वे हमें बार-बार चिताते हैं, अगर हम ध्यान दें, तो सभी पूर्ण जाग्रत हस्तियां हमें चिताने (जगाने) का ही तो काम करती हैं, पर हम जीवों की आदत ही है, मन के संग रोने-भटकने की। वे फरमाते हैं, हे प्यारों। तुम हमारी आँख से देखो, तो तुम्हें दिखेगा, अर्थात् सतगुरु भक्ति द्वारा अमृत नाम का सिमरन शुद्ध मन से करने पर ही तुम्हें वह आँख मिल सकती है पर हम लोग आँख खोलना ही नहीं चाहते, मलना भी नहीं चाहते, अब हम कचरा आँख से कैसे निकले? जब तक कचरा अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, अंदर इकट्ठा है, तो कैसे दिखे वह सतपुरूख? कैसे पाऐं  आतम रूप को? कैसे छाए आतम मस्ती?आप जी ये रोज की बातें अपनी निर्मल अनुभव वाणी के द्वारा फरमाते हैं,कि यह सीधी- साधी सच्ची बात है, पर हमारे मन को उल्टा ही सोचने, कथने, मथने की पुरानी युगांतर आदत है। क्योंकि पूर्ण सतपुरुषों ने जिस हकीकत को जाना वह पूरी कयामत के बाद की ही हकीकत है, वह आज, कल या परसों गुम होने वाली परमता नहीं है।  आपजी आतम अजन्मी बातें, ऊँची सिफत को सिखाते हैं, पर हम जब ऐसी सतसंगत नेकी वाली हकीकत को जानें तभी हमारा सोया मन जाग सकता है।
हे प्यारों! अगर सतगुरु के तत्व नाम का ध्यान बस जाए, तथा हृदय कमल में अगर से सिंहासन पाक साफ है, अर्थात् अंतर की मैल उतर गई है, तो निर्मल अति विमल व गुरुमुख उस 'हरे माधव परम दाते' में जाकर मिल सकता है। मालिक सतगुरु का प्यारा तो हमेशा तत्व नाम प्रेम में भीगा रहता है, यह मारग हवा की तरह समदर्शी है, हिन्दुओं के लिए भी यही है, मुसलमानों के लिए भी यही, सिक्ख, सिन्धी, मराठी, गुजरातियों के लिए भी यह एक ही कुल हकीकत है। और यही एको परम नूरानी मार्ग है। सो साध संगत जी ! इस देह स्वासों के रहते उस परमसत्त में एकाकार होने यत्न करना है।

फक्कड़ मौला कुल मालिक शहंशाह अपनी मौज में रुहानी मंडलों का यह खुलासा किया," कहे माधवशाह मेरे पुरखदाते, अनहल रूप रंग अचरज निज रूप हमारो" हरे माधव के रूप रंग की अचरज शोभा है,विस्माद ही विस्माद है, जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। शबद नाम का अभ्यासी गुरमुख पुरूख ही उस परम आनंद को अनुभव करता है।

परम तत्व निर्दोष समरूप ही हैं, वह समतावान हैं, जिन सतपुरुखों सतगुरुओं का अंत: करण निर्दोष समत्वमय हो, वह परम तत्व पारब्रह्म में ही स्थित है,

लाखों बाहर मुखी ज्ञानी  कह रहें कि मैं परमात्मा को जानता हूँ, बताता हूँ।  लिखित के द्वारा मैं तुम्हें समझा सकता हूँ, पर   क्या कहें ऐसे ज्ञानियों को, जिन्होंने परमात्मा को एक एल्बम में मढ़ लिया है। जब तक स्वयं की स्थिति परमतत्व में अथवा समताभाव में लीन नहीं होगी, तब तक अंतःकरण में समत्वभाव नहीं आता।

अंत:करण में समता आने पर ही सतगुरुओं, सतपुरखों की यही पहचान होती है, कि वे भजन सिमरन की भारी कमाई कर परमतत्व हरे माधव समता में स्थिति प्रज्ञावान होते हैं। गीता इसे मनुष्य जन्म की पूर्ण निजता मानती है, वे बाहर से स्वांगधारी एवं फक्कड़मौला बने दिखते हैं, जिन्हें तत्वनाम, तत्वभक्ति, तत्वअमृत का इल्म मिला, वे तत्वमुक्ता संगत से जुड़ तत्वभक्ति पा लेते हैं, क्योंकि वे तो साफ कहते हैं कि हे प्यारों! अपने क्रोध अहंकार कठोरता को जलाओ, ताकि तुम सर्वज्ञता के भवरें बन सको, क्योंकि तुम सच्चे तत्वनाम को पाकर सेवा, सिमरन, ध्यान की वेला से जुड़ अपने हृदय कंवल को फूलों की तरह महका सकते हो। दीये की तरह उसमें लौ जगाकर अखण्ड नूर का भेद पाकर ऐसी रूहानी इबादत से जुड़कर तुम्हारा रूहानी जीवन, रोम- रोम, रूहानी इत्र ही बन जाएगा।

सो हमें चाहिए अहंकार, मनमत छोड़, गुरुमत धारण कर सदैव नीवां होके सतगुरु दर पे आऐं व सतगुरु आज्ञा, शिरोधार्य कर सत् सत् कर माने, मन में शक- शुभा न आने दें। हमेशा निमाणापन कर साध-संगत की सेवा में तत्पर रहें, सदैव अमूल्य स्वासों से अमृत नाम का सिमरन-ध्यान कर अपना जीवन सफल बनाएं।

।। कहे माधवशाह मेरे पुरखदाता ।।
।। अनहल रूप रंग अचरज निज रूप हमारो ।।
।। सब गावें ताकि सदा तत्व रब  महिमा ।

हरे माधव    हरे माधव     हरे माधव