।।हरे माधव दयाल को दया ।।

वाणी सतगुरू बाबा नारायणशाह साहिब जी :
।। सतगुर अंतर के सब खोले भेद ।।
।। अंतर अमृत रूप समाया, ज्यों है तिल में तेल ।।
।। कहे नारायणशाह सुनहो संत जनों ।।
।। फक्कड़ मौला रंगीला सतगुरु पुरुख ।।
।। राम अजाना पूरा तत्व सुजाना ।।

आज के सत्संग की मधुर निर्मल संदेश से वोत्रोत रसीली अमृत वचन वाणी  शंहशाह सतगुरु बाबा नारायण शाह साहिब जी द्वारा फरमाई गई है इक मन इकटिक से वचन फरमान सुनें, जो निर्मल सच्चे पवित्र आदेश हुकुमनामे चहुँवर्णों  के जीवों के लिए सांझा पैगाम फरमान है -
सतगुरु अंतर के सब खोले भेद  
         अंतर अम्रित रूप समाया जो है तिल मैं तेल
जब से हरे माधव प्रभु के अथाह गहरे हुकुम से सृष्टि रूपी चौपड़ की बिछात हुई, धरती कालीन की तरह बिछ गई, चंद तारे, सूर्य टिमटिमाते आकाश में, अथाह के हुकुम से उभर आये ।आकाश रूपी शामियाने खड़े हो गये एकस के हुकुम से । हवा की लहरें निर्मल होकर बहने लगीं । इसे इस तरह जानें, जैसे कि आज जन्मानस पंखा- कूलर चालू करते हैं । हरे माधव अथाह पुरुख से    हुकुम हुआ, अग्निकुंड की उत्पत्ति हुई, जल राशि का भंडार हरे माधव परम ज्योत से प्रगट हो उठा ।
एक तत्व से लेकर पांच तत्वों की मनमोहक बिछातें उस हरे माधव अगम पुरख से प्रगट हो उठीं । उस हरे माधव परम अथाह पुरुख ने सारी असंख्य सृष्टियों की रचना कर उन्हें चलाने का ठेका, ठेकेदारी काल के हलवाले कर दी ।
उस हरे माधव प्रभु दाते ने मुक्ति, निर्मल भक्ति का जो भंडार है, बंदगी सिमरन का जो भंडार है, उसे न आकाशों में दफन किया, न पातलों में इसे  छिपाया । यह आकट्य सत्य है कि वह हरे माधव निर्मय परम प्रभु अगम अटूट, हदों से परे है, मन इन्द्रिय बुद्धि की पहुँच से परे है, उसे जीव छू नहीं सकता, आँखों से देख नही सकता, वह त्रिगुणातीत  है, न तप, न ज्ञान, न ध्यान से पाया जा सकता है; सतो रजो तमो से अछूता है । अब बात यह आती है कि वह अगोचर न्यारा पारब्रम्ह हरिराया जब इतनी दूर है, तो जीवों का उद्धार कैसे हो? साधसंगत जी! यह जीव तो चार खानों, अण्डज, जेरज, सेतज, उद्भुज में चौरासी के चक्कर लगाता है । मनमाया काल के कर्म और स्वभाव एवं गुण से यह जीव जड़ा भरा है ओर आत्मा सदा उसके वश में होकर भटकती रहती है । यह सिलसिला युगों कल्पों से चलता है, चल रहा है । जीवात्मा अज्ञान भवजाल में उलझी, दुखों से त्रस्त है, गोते खा रही है । पुकार हो रही है -
हिन भवसागर मां ईश्वरशाह पार लगाए

उद्धार कैसे हो ?
साधसंगत जी!  वह करुणा निधान बेअंत अगोचर हरिराया प्रभु, जीव मंडल का उद्धार करने पूरन सतगुरु, हरिराया रूप सतगुरु बन, विराट करुणा दयालरूप सतगुरु बन धरा पर प्रगट होते हैं । इसी वास्ते फरमान आया -
सतगुरु अंतर के सब खोले भेद
पूरा सतगुरु धुन्न मण्डलों के पार आतम को अपनी कमाई जागृत तवज्जू का बल देकर रसाई कराता है । वे केवल ओर केवल करुणामय रूप बनकर अंतर की साफ निर्मल एको पूर्ण सच्चाई के  सब अलौकिक भेद प्रगट करते हैं । आप देखो जैसे समुद्र का ऊफान, लहरें कभी बंद नही होते, इसी तरह कमाई वाले पुरुनूर सतगुरु के विराट दिल, विराट आतम से करुणामय लहरें अमृत रूप में अनवरत बहती हैं । जब वे लहरें धरा जगत के मध्य प्रगट करते है, तब सत्त रूप के, अगम अथाह ज्योत के किनारे बनते हैं यानि पुरण साधसंगत ।
फिर ऐसी कमाई वाले सतगुरु करुणा रूप, मौन समत्व, अनहद समत्व, से अपना कुर्ब सत्संग वचन देकर प्यारी समझाश देते हैं कि ऐ आतम! तेरे अंदर अमृत रूप है, अमरता का तू रस पी, फिर उड़ चलो अमरता की ओर -
   अन्तर अमृत रूप समाया, ज्यों है तिल में तेल
तिल को पिसा गया, तेल निकला, जो शरीर की मांसपेशियां, ग्रंथियां बंद थी, जब तेल से मला गया तो मांसपेशियां खुल गईं यानि जकड़न, यह  जड़ शरीर की स्वस्थता के लिए ठीक मुबारक है, लिकेन गुरु की प्यारी संगत! हम जड़ चेतन की गाँठो का तेल तिल की बात कर रहे हैं,
इशारे अंतरमुखी हैं, भक्तिमय हैं, जागृतमय हैं । जिस औषधि में जो अर्क तत्व हरे माधव अगम पारब्रह्म ने रखा है, उस अर्क तत्व को केवल सफल जानकार हाकिम वैद्य ही निकाल सकता है और वह है कमाई वाला पूरण रहबर । जब हाकिम वैद्य, जंगलों से औषधि की पहचान कर उन्हें ले आए, फिर हाकिम ने सिलबट्टे-कूल्हे में कूटकर अर्क निकल लिया, अर्क को आकार दे दिया । रोग के अनुसार पुड़ियां बनाई, जैसे-जैसे रोग हुए, नब्ज़ देख पुड़ियां दे दी । जब हमने नियमित खाईं, स्वस्थता आ प्रगटी । उसी प्रकार जीव के अंदर रखे अमृत अर्क तत्व को प्रगट कर जागृत कर आंतरिक आतम स्वस्थता को देने में केवल और केवल वक़्त का पूरण सतगुरु ही समर्थवान है।
अब हम ज़रा इसे बारीकी से समझें, कि नामक का स्वाद अपना है, शक्कर का स्वाद अपना होगा, धरती का प्रताप अपना है, आकाश का प्रताप  अपना तो होगा ही, हवाओं का अपना, सूरज, चाँद, तारों का प्रभाव अपना है, इसी तरह कायनात चराचर सृष्टि में मौसम बनते बिगड़ते हैं, वायु प्रदुषित होती है, शुद्ध होती है, बहती है, आज से पच्चीस-तीस साल पहले वातावरण-हवाओं की क्या दशा थी और आज क्या है, यह किसी से छिपी नहीं । जीव आते हैं, जीव चले जाते हैं, कभी धरती धारातल में लय प्रलय होते हैं, कभी महाप्रलय के गुंजन होते हैं, बड़ी रहस्यमय गुत्थी के रंगों से यह कायनात और जीवात्मा पिरोया है । संगतों! पूर्ण समरथ सतगुरु इस चिरंकाल कि गुत्थी को सहज ही सुलझा देते हैं, वे जड़ चेतन कि गाँठों को भी सुलझा देते हैं, पूरन सतगुरु पराविद्या के दाते दातार होते हैं ।
सतगुरु लोक परलोक में आत्मओं के दिव्य सहायक हैं, सतगुरु परम सत्त सत्त सत्त हैं जो कण-कण में, ज़र्रे-ज़र्रे में आत्माओं की रसाई कराते हैं । संगतों! यह हरिरूप पूरण सतगुरु भजन-सिमरन की कमाई वालों की दुनिया है, आत्माओं कि रसाई, शास्वत मुक्ति उन्हीं के हथ है, बाकी क्षणभंगुर चमत्कार माटी की तरह होते रहते हैं । जिन जीवों का हरिरूप सतगुरु के चरणो में प्यार ठौर इक भरोसा है, हर पल पूरन सतगुरु के चरणों में अनवरत चित्त जुड़ा हुआ है, पूरन सतगुरु का ध्यान हृदय में बस गया है, उन जीवों के तो हृदय भी दिव्य, रूह भी दिव्य, आतम भी दिव्य परम प्रकाशमय हो जाती है । साधसंगत जी! पूरण सतगुरु का ध्यान भी प्रकाशमय है, जिन जीवों ने सतगुरु ध्यान कर सतगुरु चरणों की बंदगी कमाई की, पूरण सतगुरु सदा उनके अंग-संग, लोक-परलोक में सदा सहाई हैं । धर्मराज के दरबार मे जब कर्मों का लेखा पूछा जाता है, तब करुणा कुर्ब रूप मेहरबान पूरन सतगुरु दरगाही वकील, दरगाही जज बन उन जीवात्मओं को सारे बंधनों से छुड़ा देते हैं, यह परम सत्य का अध्याय हाज़िर दीवानों में खुला है ।
हरे माधव प्रभु की प्यारी संगतों! हमें चाहिए बिना किसी नागा के, रोज़ाना नित-नीयम से सतगुरु साहिबान जी द्वारा बक्शे गए अमृत नाम का सिमरन स्वांस-स्वांस करते हुए, सतगुरु श्री चरणों में अटूट प्रेम रमाए रहें, ये आँखें कुछ देखें तो छवि सतगुरु की हो, ये हृदय धड़के तो धड़कन सतगुरू की हो । हे सतगुरु सच्चे पातशाह! बस यही पुकार है कि युहीं आपजी के श्रीचरणों में यह ज़िंदगानी गुज़र जाए, आपजी अपनी चरण सेवा, चरण बंदगी बक्शें और अंत वेले, हमारी रूह का हाथ थाम अपने धाम ले चले सदा के लिये अपने हरे माधव धाम ले चलें, सदा के लिए अपने हरे माधव धाम ले चलें ।

।। कहे नारायणशाह सुनहो संत जनों ।।
।। फक्कड़ मौला रंगीला सतगुरु पूरुख ।।
।। राम अजाना पूरा तत्व  सुजाना ।।
।। सतगुरु अंतर के सब खोले भेद ।।

हरे माधव हरे माधव हरे माधव